कुमार मुकुल ने एक आशातीत विकास किया है इन पांच-छ: वर्षों में-संघर्ष बहुत लोग करते हैं पर कवि नहीं हो पाते। रिल्‍के का केदार जी ने अनुवाद किया है-... मुकुल ने पढा होगा-तो उनके यहां जो भोलापन है उससे भी कविता लिखी जा सकती है। वे लिखते हैं - ईश्‍वर मैं तुम्‍हारा जलपात्र हूं, मैं टूटूंगा , तो तुम पानी कैसे पीओगे...। तो जो एक विस्‍मयबोध होता है कवियों में वह मुकुल में दिखता है - कुमार के साथ अच्‍छी बात यह है कि - वे किसी टाइप या उद्देश्‍य को लेकर नहीं चलते। उनके यहां ऐसी सहज और लोकतांत्रिक विविधता है-जैसे एक सहज नन्‍हा बच्‍चा। वे इतने सेंसुअस हैं-मसृण। एक डेमो‍क्रेटिक डाइवर्सिटी है इनमें। उनकी कविताएं एक ही निशाने पर सारे तीर नहीं चूकती हैं- वहां विशाल संसार है-जिसमें इतना आस्‍वाद है- इतना रसोद्रेक है...ये उत्‍तर भारतीय समाज के खास कवि हैं- कवि... असद जैदी मुझे सौदर्यवादी कहते थे- तो कुमार मुकुल सौंदर्यवादी हैं - आलोक धन्‍वा, समकालीन कविता

रविवार, 17 मई 2015

दाएं हाथ का दर्द और रोटी बनाने की कला

पॉलीथीन में डाल
सामने खूंटी से
लटका दी हैं रोटियां मैंने
कि नम रहें वो देर तक
और चींटियां भी ना पहूंच सकें वहां तक
पंद्रह साल पहले दीपक गुप्ता ने सिखाए थे ये ढब
रोटियां मुलायम रखने के
अब जबकि अरसा हुए उसे बेरोजगार से प्रोफेसर हुए
वह भी भूल चुका होगा ये ढब

ये रोटियों कुछ झुलसी सी हैं
अपने कवि मित्र सी एकसार
फूली पतली उजली रोटियों नहीं बना पाता मैं
वैसी निश्चिंतता नहीं मेरे पास
महानगर में एक मकान नहीं उसकी तरह
जिससे मरने पर ही बे‍दखल किया जासके
उसकी तरह बीबी नहीं समझदार
कि बिना झूमर पारे ठिकाना अलग कर ले
ना पटने पर
और वैसा मालिक भी नहीं जिसकी
कमजोरियां जानता है वह

सुंदर तो नहीं
पर कई कई तरह की रोटियां बनाता हूं मैं
प्रिय कवि ऋतुराज माफ करें
अपनी रोटियों को कला नहीं घोषित करना मुझे
कि भूख में भरपूर स्वाद के साथ उनका मौजूद रहना ही
काफी है मेरे लिए
कि कभी कभार हल्की घी चुपड लेता हूं उस पे
मां की दी हुयी
छालियों से तैयार दही को मथकर
निकालती है मां
छठे छमाही पाव भर घी
छठे छमाही दिल्ली से पटना जाने पर
थमा देती है छोटी सी प्लास्टिक की शीशी में
जिसे तीन महीने चला लेता हूं मैं
पता नहीं कैसे
खत्म ही नहीं होता मां का दिया पाव भर घी
बीच बीच में कहती हैं मां फोन कर
कि ध्यान रखिह देह के ......
इतना ही जाना है मां ने उम्र भर
देह का ध्यान रखना
पिता की देह का ध्यान रखा अब तक
अब बेटे की देह का ध्यान रखना चाहती है
मां मां
मैं ठीक हूं
रोज जमा लेता हूं दही ढाई सौ ग्राम
कि दिमाग ठंडा रहे
और तुम्हारी तरह
मेरी दाहिनी हाथ में भी दर्द रहता है अब
बराबर
और इस दर्द को पोसे रखना चाहता हूं मैं
याद में तुम्हारी
कि एक दर्द काटता है दूसरे दर्द को ...
आखिर इस दर्द में भी पछीटती रहती है मां
पिता के कपडे
पिता की रोटियां बेलती रहती है पचहत्तर की इस उम्र में
कि वेसी रोटियां बोल नहीं पाता कोई
जिसमें दाहिने हाथ का दर्द मिला हो

और मां
मेरी बनाई रोटियों
बेटों को भी पसंद आती हैं
खाते हैं वे सराह सराह कर
और आभा को भी बुरी नहीं लगतीं

कई कई तरह की रोटियों
बनाता हूं मैं
कभी तवे के आकार की
कभी प्लेट के आकार की
कभी सादी
कभी प्याज टमाटर नमक सानकर
कभी मकई के आंटे से बनी सी बडी और कडी
कभी सीधे आग पर सिंकी बिल्कुडल मुलायम

खा भी लेता हूं उन्हें
कई कई तरह से
कभी लहसुन के अचार से
कभी जैम से
कभी आमलेट से
और अक्सर सब्जी से

और याद करता हूं मीर को
कि जान है तो जहान है प्या रे
मीर अम्दन भी कोई मरता है ...

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा-
याद नहीं इतनी चोट मारती और याद को ताजा कराती कविता मैंने पहले कब पढ़ी थी। रोटियां हमें इतना कुछ सोचने का वक्त दे सकती है, कभी ध्यान नहीं दिया था। हम निश्चिंत होकर रोटी बनाते हैं तो क्या ऐसी बातों को सोच सकते हैं..
मां और घी के बहाने आपने ऐसी कई यादों को ताजा कर दिया.
शुक्रिया
1 नवंबर 2009 को 9:30
 Pankaj Parashar ने कहा-
kya likha hai aapne bhaijan, adbhut! Kalam chum lene ko jee chahata hai.

2 नवंबर 2009 को 12:06